कितना अद्भुत है यह सोच पाना कि धरती के जिस टुकड़े पर बैठ मैं बारिश के सौंदर्य-रस का पान कर रही हूं, हजारों साल पहले धरती के इसी टुकड़े पर किसी ने ऐसे ही आनंद लिया होगा... तब मैं नहीं थी।
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