काम करने की जगह ऐसी हो, जहां उसकी क्षमताओं में वृद्धि हो; जो उसे एक खुले मैदान जैसी लगे, न कि चारदिवारी की कैद जैसी। वहां आत्मसम्मान मिले जहां जाकर वह खुश हो। जहां जाकर उसे लगे कि वह अपने सीखे हुए का सार्थक इस्तेमाल कर सकता है और उसके किए कामों को सिर्फ उसकी जिम्मेदारी मान कर अनदेखा नहीं कर दिया जाएगा, बल्कि उसे उसका श्रेय भी मिलेगा।
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