Skip to main content

दुनिया मेरे आगे: प्रकृति का प्रतिसाद

अगर जीवन के हर एक क्षण को हम कुदरत का प्रसाद मान ले तो सारे तनाव एक क्षण ही में खत्म हो जाते हैं। जब हम यह स्वीकार कर लेते हैं, तो हमारा जीवन भी ‘प्रसादिक’ हो जाता है। इस विशाल ब्रह्मांड के कण-कण में आनंद छिपा हुआ है, लेकिन इंसान स्वार्थी बन कर सारा आनंद अकेले ही अपनी तिजोरी में भर लेना चाहता है।

from Jansattaदुनिया मेरे आगे – Jansatta https://ift.tt/2WqfEsD

Comments