एक सच्चाई यह भी है कि आज भी पारिवारिक-सामाजिक भीरुता और कुंद सोच अधिकतर मामलों की शिकायत दर्ज नहीं होने देती। पूर्णबंदी के दौरान भी स्त्री के खिलाफ यौन हिंसा और बलात्कार की ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जो सोचने पर विवश कर रही हैं कि आखिर लड़कियां किस उम्र में और स्थान पर सुरक्षित हैं?
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