रबीन्द्रनाथ ठाकुर अपने युग के अद्भुत संगीत मर्मज्ञ रहे हैं। ‘गीत वितान’ में रवींद्र ने अपने गीतों को ‘गान’, ‘बंधु’, ‘प्रार्थना’, ‘विरह’, ‘साधना और संकल्प’, ‘अंतर्मुख’, ‘नि:संशय’, ‘उत्सव’, ‘बाउल’ आदि उपशीर्षकों से संयोजित करते बाकायदा उनकी स्वरलिपि भी दी है।
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